प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साइप्रस यात्रा यूँ ही एक सामान्य दौरा नहीं है, बल्कि इसके कई महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं जो भारत और साइप्रस दोनों देशों के लिए रणनीतिक और कूटनीतिक रूप से अहम हैं। आईये जानते हैं इस यात्रा के कुछ प्रमुख पहलुओं को।
Landed in Cyprus. My gratitude to the President of Cyprus, Mr. Nikos Christodoulides for the special gesture of welcoming me at the airport. This visit will add significant momentum to India-Cyprus relations, especially in areas like trade, investment and more.@Christodulides pic.twitter.com/szAeUzVCem
— Narendra Modi (@narendramodi) June 15, 2025
भारत और साइप्रस के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध रहे हैं, लेकिन उच्च-स्तरीय यात्राओं का अभाव रहा है। प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा इस कमी को दूर करेगी और दोनों देशों के बीच राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सहयोग को बढ़ावा देगी। विभिन्न क्षेत्रों में नए समझौतों पर हस्ताक्षर होने की संभावना है, जिससे द्विपक्षीय संबंधों को एक नई दिशा मिलेगी।
Έφθασα στην Κύπρο. Εκφράζω την ευγνωμοσύνη μου στον Πρόεδρο της Κύπρου, Κο. Νίκο Χριστοδουλίδη για την ξεχωριστή χειρονομία και για την υποδοχή μου στο αεροδρόμιο. Αυτή η επίσκεψη θα προσθέσει σημαντικές ώθηση στις σχέσεις Ινδίας-Κύπρου, ειδικά σε τομείς όπως το εμπόριο, τις… pic.twitter.com/Vkc2mwP10a
— Narendra Modi (@narendramodi) June 15, 2025
साइप्रस पूर्वी भूमध्यसागर में स्थित एक महत्वपूर्ण द्वीप राष्ट्र है। यह यूरोप, एशिया और अफ्रीका के जंक्शन पर स्थित होने के कारण रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक अस्थिरता के बीच, साइप्रस के साथ मजबूत संबंध स्थापित करना भारत के लिए अपने हितों की रक्षा और क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने में सहायक होगा।
साइप्रस यूरोपीय संघ का सदस्य है। साइप्रस के साथ अच्छे संबंध भारत को यूरोपीय संघ के साथ अपने संबंधों को और मजबूत करने में मदद कर सकते हैं। यूरोपीय संघ एक महत्वपूर्ण व्यापारिक भागीदार है, और साइप्रस के साथ घनिष्ठता से भारत को यूरोपीय संघ के देशों के साथ विभिन्न मुद्दों पर बेहतर समन्वय स्थापित करने में सहायता मिलेगी।
साइप्रस और तुर्की के बीच ऐतिहासिक रूप से तनाव रहा है। तुर्की साइप्रस के उत्तरी भाग को एक अलग राष्ट्र के रूप में मान्यता देता है, जिसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी की साइप्रस यात्रा को इस संदर्भ में भी देखा जा रहा है। भारत हमेशा से साइप्रस की संप्रभुता और भारत और साइप्रस विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों जैसे संयुक्त राष्ट्र और गुटनिरपेक्ष आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेते रहे हैं। इस यात्रा के दौरान, दोनों नेता इन मंचों पर आपसी सहयोग और समन्वय को और बढ़ाने पर विचार-विमर्श कर सकते है।
साइप्रस ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान आतंकवाद के मुद्दे पर भारत का समर्थन किया था, जबकि तुर्की ने पाकिस्तान का साथ दिया था। इस संदर्भ में मोदी की साइप्रस यात्रा, भारत द्वारा साइप्रस के प्रति समर्थन और तुर्की के प्रति अप्रसन्नता व्यक्त करने के रूप में देखी जा रही है।
तुर्की ने 1974 से साइप्रस के एक तिहाई हिस्से पर कब्ज़ा कर रखा है और तथाकथित ‘तुर्की गणराज्य उत्तरी साइप्रस’ का समर्थन करता है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त नहीं है। भारत हमेशा से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार साइप्रस समस्या के समाधान का समर्थक रहा है। मोदी की यह यात्रा इस मुद्दे पर भारत के रुख को और मजबूत करती है।
यह यात्रा तुर्की को एक स्पष्ट संदेश देती है कि भारत उन देशों के साथ अपने संबंधों को महत्व देता है जो क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर उसका समर्थन करते हैं। भारतीय मीडिया भी इस यात्रा को तुर्की के प्रति एक प्रतिक्रिया के रूप में प्रमुखता से दिखा रहा है।भारत और साइप्रस के बीच ऐतिहासिक रूप से अच्छे संबंध रहे हैं, लेकिन किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह 23 वर्षों में पहली साइप्रस यात्रा है। इससे पता चलता है कि भारत अब साइप्रस के साथ अपने संबंधों को और अधिक महत्व दे रहा है, खासकर क्षेत्रीय समीकरणों को देखते हुए।


