अमेरिका के राष्ट्रपति ने भारत पर 25% टैरिफ लगा दिया है और रूसी तेल खरीदने को लेकर आगे और भी कड़े प्रतिबंध लगाने की धमकी दी है. ऐसे में भारत के लिए यह ज़रूरी हो गया है कि वह अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाए रखे. चीन जाकर मोदी एक तरह से यह संकेत दे रहे हैं कि भारत सिर्फ एक ही महाशक्ति पर निर्भर नहीं है. भारत अपनी ऊर्जा और व्यापारिक नीतियों को अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार चलाता रहेगा, भले ही अमेरिका को वह पसंद न हो. यह दौरा भारत की बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था (multipolar world order) की सोच को मज़बूती देता है, जिसमें कोई एक देश पूरी दुनिया को नियंत्रित नहीं कर सकता.
चीन के साथ संबंधों को सामान्य करने की कोशिश
यह दौरा गलवान संघर्ष के बाद पीएम मोदी का पहला चीन दौरा है. दोनों देशों के बीच सीमा पर तनाव कम करने की कोशिशें पिछले कुछ समय से चल रही हैं. इस दौरे से उम्मीद है कि दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य करने की दिशा में और प्रगति होगी. यह दौरा शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में हो रहा है, जो कि एक क्षेत्रीय मंच है. इस मंच पर भारत, चीन और रूस जैसे देशों के नेता एक साथ मिलकर क्षेत्रीय सुरक्षा, आतंकवाद और व्यापार जैसे मुद्दों पर चर्चा करेंगे.
रूस के साथ संबंधों पर मज़बूती
अमेरिकी टैरिफ का एक बड़ा कारण भारत का रूस से तेल खरीदना भी है. चीन और रूस के संबंध पहले से ही मजबूत हैं. पीएम मोदी का चीन दौरा रूस के साथ भारत के संबंधों को भी एक नई दिशा दे सकता है. यह दौरा भारत को अमेरिका के दबाव के खिलाफ एक मजबूत स्टैंड लेने में मदद करेगा और यह दिखाएगा कि भारत अपने पुराने और विश्वसनीय दोस्तों को नहीं छोड़ेगा.
कुल मिलाकर, अमेरिका के टैरिफ के बाद पीएम मोदी का यह दौरा भारत की विदेश नीति की स्वतंत्रता और रणनीतिक स्वायत्तता को दर्शाने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है. यह दिखाता है कि भारत वैश्विक भू-राजनीति में एक स्वतंत्र और संतुलित भूमिका निभाना चाहता है.


