देश की राजधानी दिल्ली एक बार फिर जहरीली धुंध (Smog) की चादर में लिपटी हुई है। पिछले 48 घंटों में दिल्ली का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 450 के ‘गंभीर प्लस’ (Severe+) स्तर को पार कर गया है। आनंद विहार, बवाना और मुंडका जैसे इलाकों में तो यह आंकड़ा 500 के करीब पहुँच चुका है, जो स्वस्थ इंसान के फेफड़ों के लिए भी जानलेवा है।
GRAP-4 लागू: क्या हैं नई पाबंदियाँ?
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने बिगड़ते हालातों को देखते हुए ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP) का चौथा चरण लागू कर दिया है। इसके तहत:
- निर्माण कार्यों पर बैन: हाईवे, फ्लाईओवर और पावर ट्रांसमिशन जैसे सभी निर्माण कार्यों पर पूर्ण रोक लगा दी गई है।
- ट्रकों की नो-एंट्री: आवश्यक सेवाओं को छोड़कर, डीजल से चलने वाले भारी वाहनों का दिल्ली में प्रवेश वर्जित है।
- स्कूल और दफ्तर: दिल्ली सरकार ने 10वीं और 12वीं को छोड़कर सभी कक्षाएं ऑनलाइन कर दी हैं। साथ ही, सरकारी दफ्तरों को 50% क्षमता के साथ चलाने और निजी संस्थानों को ‘वर्क फ्रॉम होम’ की सलाह दी गई है।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप या समाधान?
जहाँ एक तरफ जनता मास्क लगाकर जीने को मजबूर है, वहीं राजनीति की हवा भी गर्म है। सरकार का दावा है कि पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने की घटनाओं और भौगोलिक स्थितियों के कारण प्रदूषण बढ़ रहा है। दूसरी ओर, विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली के स्थानीय कारक जैसे वाहनों का धुआं (Vehicular Emission) और धूल भी उतने ही जिम्मेदार हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने भी सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि “प्रदूषण मुक्त हवा में सांस लेना नागरिकों का मौलिक अधिकार है और सरकारों की सुस्ती इसे छीन रही है।” कोर्ट ने सरकारों से सवाल किया है कि जब स्थिति गंभीर होती है, तभी पाबंदियां क्यों लगाई जाती हैं? पूरे साल ठोस एक्शन प्लान क्यों नहीं दिखता?
स्वास्थ्य चेतावनी: अस्पतालों में बढ़ी भीड़
राजधानी के बड़े अस्पतालों (AIIMS, सफदरजंग) में सांस के मरीजों की तादाद में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। डॉक्टरों ने बुजुर्गों और बच्चों को सुबह-शाम की सैर से बचने और घर के अंदर रहने की सख्त सलाह दी है।
क्या ‘कृत्रिम वर्षा’ (Cloud Seeding) है दिल्ली का आखिरी सहारा?
जब प्रदूषण की परतें इतनी मोटी हो जाएं कि हवा की रफ्तार भी उन्हें न हटा सके, तब एकमात्र उम्मीद ‘आसमान से होने वाली धुलाई’ पर टिकी होती है। दिल्ली सरकार और आईआईटी कानपुर के विशेषज्ञ अब क्लाउड सीडिंग यानी कृत्रिम बारिश की तकनीक पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं।
कैसे काम करती है यह तकनीक? कृत्रिम बारिश कराने के लिए हवाई जहाज या फ्लेयर्स के जरिए बादलों के बीच सिल्वर आयोडाइड (Silver Iodide), पोटेशियम आयोडाइड या ड्राई आइस का छिड़काव किया जाता है। ये तत्व बादलों में मौजूद नमी को बर्फ के कणों में बदलते हैं, जिससे वे भारी होकर बारिश के रूप में जमीन पर गिरते हैं।
प्रदूषण कम करने में इसकी भूमिका: बारिश की बूंदें हवा में तैर रहे PM 2.5 और PM 10 जैसे सूक्ष्म कणों को अपने साथ सोख लेती हैं और उन्हें जमीन पर बैठा देती हैं। इसे ‘वॉश-आउट’ इफेक्ट कहा जाता है, जिससे AQI का स्तर अचानक 400 से गिरकर 100-150 तक आ सकता है।
चुनौतियां और पेंच: हालाँकि यह सुनने में जादुई समाधान लगता है, लेकिन इसके लिए कुछ ‘असंभव’ शर्तें पूरी होनी जरूरी हैं:
- बादलों की मौजूदगी: बिना बादलों के सीडिंग नहीं हो सकती। दिल्ली की सूखी सर्दियों में नमी वाले बादल मिलना मुश्किल होता है।
- हवाई अनुमति: दिल्ली का हवाई क्षेत्र (Airspace) सामरिक रूप से बेहद संवेदनशील है। इसके लिए रक्षा मंत्रालय और नागरिक उड्डयन मंत्रालय से कई स्तरों पर क्लियरेंस की जरूरत होती है।
- खर्च: यह एक बेहद महंगी प्रक्रिया है और इसका असर केवल कुछ घंटों या दिनों तक ही रहता है।


