ढाका: करीब 6,314 दिनों का लंबा निर्वासन खत्म कर तारीक़ रहमान (BNP के कार्यवाहक अध्यक्ष) अपनी सरजमीं पर लौट आए हैं। शेख हसीना के पतन के बाद खाली हुए राजनैतिक मैदान में रहमान की एंट्री ने 2026 में होने वाले आम चुनावों की तस्वीर पूरी तरह बदल दी है।
BNP का पुनरुत्थान: बिखरे हुए कार्यकर्ताओं में नई जान
तारीक़ रहमान की वापसी से सबसे बड़ा फायदा उनकी पार्टी, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) को हुआ है। पिछले डेढ़ दशक से दमन झेल रहे कार्यकर्ताओं के लिए वह एक ‘मसीहा’ की तरह लौटे हैं। जानकारों का मानना है कि उनकी मौजूदगी से पार्टी का संगठन चुनाव से पहले और अधिक आक्रामक और एकजुट होगा।
‘बांग्लादेश फर्स्ट’ पॉलिसी: विदेश नीति में बड़े बदलाव के संकेत
रहमान ने लौटने के साथ ही अपना विजन साफ कर दिया है। उन्होंने ‘समावेशी बांग्लादेश’ (Inclusive Bangladesh) का नारा दिया है, जहाँ हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध और ईसाई सभी सुरक्षित महसूस करें।
- भारत के साथ रिश्ते: रहमान ने पहले ही संकेत दिए हैं कि उनकी नीति ‘दिल्ली या रावलपिंडी’ के बजाय ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ पर आधारित होगी। भारत के लिए यह एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती हो सकती है, क्योंकि अतीत में BNP का रुख भारत विरोधी माना जाता रहा है।
मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार पर दबाव
मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली कार्यवाहक सरकार फिलहाल देश चला रही है। तारीक़ रहमान की वापसी से अब जल्द चुनाव कराने का दबाव चरम पर होगा। रहमान का ‘I Have a Plan’ (मेरा एक प्लान है) वाला भाषण संकेत देता है कि वे अब और इंतज़ार करने के मूड में नहीं हैं।
अवामी लीग के लिए ‘अस्तित्व’ का संकट
शेख हसीना के देश छोड़ने और अवामी लीग के कई नेताओं के भूमिगत होने के बाद, तारीक़ रहमान की वापसी इस पार्टी के लिए ‘ताबूत में आखिरी कील’ साबित हो सकती है। रहमान उस ‘वैक्यूम’ को भरने की कोशिश कर रहे हैं जो हसीना के जाने से पैदा हुआ है।
कट्टरपंथी ताकतों पर लगाम या साथ?
बांग्लादेश में पिछले कुछ समय से इस्लामी कट्टरपंथी ताकतों का प्रभाव बढ़ा है। दुनिया की नज़रें इस बात पर टिकी हैं कि क्या रहमान इन ताकतों को अपने साथ मिलाएंगे या एक उदारवादी नेता के रूप में खुद को पेश कर उन्हें किनारे करेंगे। उनके शुरुआती भाषणों में ‘शांति और सुरक्षा’ पर ज़ोर देना इसी दिशा में एक कदम माना जा रहा है।
तारीक़ रहमान की वापसी ने बांग्लादेश को एक नए चौराहे पर खड़ा कर दिया है। जहाँ एक तरफ लोकतंत्र की बहाली की उम्मीद है, वहीं दूसरी तरफ पुरानी राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता और हिंसा के लौटने का डर भी है। आने वाले कुछ महीने तय करेंगे कि क्या रहमान बांग्लादेश को ‘नया सवेरा’ दे पाएंगे या इतिहास खुद को दोहराएगा।


