महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। साल 2025 के शुरुआती तीन महीनों में ही 767 किसानों ने अपनी जान गंवा दी है। यह आंकड़े राज्य सरकार के एक मंत्री ने विधान परिषद में एक सवाल के जवाब में पेश किए, जिससे राज्य में कृषि संकट की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है। चौंकाने वाली बात यह है कि आत्महत्या करने वाले ज्यादातर किसान विदर्भ क्षेत्र से हैं, जो लंबे समय से सूखे और कर्ज के बोझ से जूझ रहा है।
इन आंकड़ों के सामने आने के बाद विपक्ष ने सरकार पर जमकर हमला बोला है। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरा है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए कहा कि यह बेहद दुखद है कि सिर्फ तीन महीनों में महाराष्ट्र में 767 किसानों ने आत्महत्या कर ली। उन्होंने केंद्र सरकार पर किसानों की दुर्दशा को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया और सवाल उठाया कि क्या सरकार के लिए यह सिर्फ एक आंकड़ा है, जबकि वास्तविकता यह है कि 767 परिवार तबाह और बिखर गए हैं। राहुल गांधी ने यह भी कहा कि मौजूदा सिस्टम किसानों को मार रहा है और प्रधानमंत्री मोदी सिर्फ अपने पीआर के तमाशे में व्यस्त हैं।
आंकड़ों के अनुसार, इस साल जनवरी से मार्च तक हर दिन औसतन 8 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है। यह स्थिति किसानों की आर्थिक तंगी, फसल की बर्बादी और कर्ज के बढ़ते बोझ को दर्शाती है। सरकार की तरफ से किसानों को राहत और मुआवजा देने के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। रिपोर्टों के अनुसार, आत्महत्या करने वाले 767 किसानों में से केवल 373 किसानों के परिवारों को ही सरकारी मदद मिल पाई है। यह आंकड़ा सरकारी योजनाओं की नाकामी और किसानों तक समय पर सहायता पहुंचने में विफलता को दर्शाता है।
महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में किसानों की आत्महत्या की समस्या कोई नई नहीं है। यह क्षेत्र लंबे समय से सूखे, अनियमित मानसून और फसल की बीमारियों से जूझ रहा है। इसके कारण किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है और वे कर्ज के जाल में फंस जाते हैं। बैंकों और साहूकारों से लिए गए कर्ज को चुकाने में असमर्थ किसान अंततः आत्महत्या जैसा कदम उठाने को मजबूर हो जाते हैं।
राज्य सरकार ने किसानों की समस्याओं को दूर करने और उन्हें आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। इनमें फसल बीमा योजना, कर्ज माफी योजना और कृषि ऋण पर ब्याज में छूट जैसी योजनाएं शामिल हैं। हालांकि, इन योजनाओं के क्रियान्वयन में कई तरह की कमियां सामने आती रही हैं, जिसके कारण जरूरतमंद किसानों तक इनका लाभ नहीं पहुंच पाता है। मुआवजा राशि मिलने में देरी और अपर्याप्त मुआवजा भी किसानों की निराशा को और बढ़ाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों की आत्महत्या की समस्या का समाधान सिर्फ आर्थिक सहायता या कर्ज माफी से नहीं हो सकता है। इसके लिए कृषि क्षेत्र में दीर्घकालिक और स्थायी सुधार करने की आवश्यकता है। सिंचाई सुविधाओं का विकास, बेहतर बीज और उर्वरक की उपलब्धता, फसल की उचित कीमत सुनिश्चित करना और किसानों को गैर-कृषि आय के अवसर प्रदान करना भी जरूरी है।
महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या के बढ़ते आंकड़े न केवल राज्य सरकार बल्कि केंद्र सरकार के लिए भी एक बड़ी चुनौती हैं। यह जरूरी है कि सरकार इस गंभीर समस्या पर तत्काल ध्यान दे और किसानों की आय बढ़ाने, कृषि को टिकाऊ बनाने और उन्हें कर्ज के जाल से निकालने के लिए ठोस कदम उठाए। अगर सरकार जल्द ही प्रभावी उपाय नहीं करती है, तो यह संकट और गहरा सकता है और इसका असर राज्य की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। किसानों की जान बचाने के लिए अब और देर करना उचित नहीं है।


